काशी में जीवित हुई शास्त्रार्थ परंपरा

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भारत की शास्त्रार्थ परंपरा एक बार फिर से काशी में जीवित हुई है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शुक्रवार को तीन दिवसीय अंतराष्टरीय शास्त्रार्थ सम्मेलन शुरू हो गया। पहले दिन न्याय और दर्शन विषय पर विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ हुआ। न्याय में व्याप्ति के विभिन्न स्वरूपों और दर्शन में ब्रह्म विषय पर चर्चा हुई। शास्त्रार्थ में देश के संस्कृत विद्वानों के साथ ही नेपाल, भूटान, बर्मा के भी 100 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए हैं।


शास्त्रार्थ में वैदिक गणित, ज्योतिष, प्राचीन न्याय, योग, आयुर्वेद, द्वैत वेदांत, वेदांत सहित अन्य विषयों पर चर्चा-परिचर्चा करेंगे। छात्रों के बीच अलग से शास्त्रार्थ होगा। इसके अलावा गुरुकुलों में आयुर्वेद, धनुर्वेद और अर्थशास्त्र विषय पर पूर्व कुलपति प्रो.वी.कुटुंब शास्त्री ने व्याख्यान दिया।


भूटान के स्वामी विवेकानंद सरस्वती और इंडिक अकादमी के नागराज पातुरी ने व्याख्यान दिया। इसी के साथ वेदभवन में अग्निहोत्र ओमकार यशवंत सेलुकर ने मार्ग निर्देशन में यज्ञ आरंभ हुआ। उनके नेतृत्व में तिरूपति से आई टीम कल राष्ट्र के कल्याण के मित्रविंदा यज्ञ करेगी। कई चरणों में रात्रि 11 बजे तक विभिन्न सत्र चलेंगे।


वैदिक काल में ज्ञान के लिए शास्त्रार्थ 

प्राचीन भारत में दार्शनिक एवं धार्मिक वाद-विवाद, चर्चा या प्रश्नोत्तर को शास्त्रार्थ (शास्त्र + अर्थ) कहते थे। इसमें दो या अधिक व्यक्ति किसी गूढ़ विषय के असली अर्थ पर चर्चा करते थे। किसी विषय के सम्बन्ध में सत्य और असत्य के निर्णय हेतु परोपकार के लिए जो वाद-विवाद होता है उसे शास्त्रार्थ कहते हैं। शास्त्रार्थ का शाब्दिक अर्थ तो शास्त्र का अर्थ है , वस्तुतः मूल ज्ञान का स्रोत शास्त्र ही होने से प्रत्येक विषय के लिए निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए शास्त्र का ही आश्रय लेना होता है। अतः इस वाद-विवाद को शास्त्रार्थ कहते हैं। इसमें तर्क, प्रमाण और युक्तियों के आश्रय से सत्यासत्य निर्णय होता है। शास्त्रार्थ और डिबेट में बहुत अन्तर है। शास्त्रार्थ विशेष नियमों के अंतर्गत होता है,अर्थात ऐसे नियम जिनसे सत्य और असत्य का निर्णय होने में आसानी हो सके इसके विपरीत डिबेट में ऐसे पूर्ण नियम नहीं होते। शास्त्रार्थ में महर्षि गौतम कृत न्यायदर्शन द्वारा प्रतिपादित विधि ही प्रामाणिक है। वैदिक काल में एक से बढ़कर एक विद्वान ऋषि थे , उस काल में भी शास्त्रार्थ हुआ करता था। वैदिक काल में ज्ञान अपनी चरम सीमा पर था। उस काल में शास्त्रार्थ का प्रयोजन ज्ञान की वृद्धि था, क्योंकि उस काल में कोई भ्रम नहीं था। उस काल में शास्त्रार्थ प्रतियोगिताएं होती थी। 


Source:https://www.livehindustan.com/uttar-pradesh/varanasi/story-viday-kashyastha-survived-the-cremation-tradition-more-than-100-scholars-from-across-the-country-and-abroad-2624488.html

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