गोवर्धन के रूप में होती है भगवान श्रीकृष्ण की पूजा, मिलता है यह लाभ

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 दिवाली के त्योहार के अगले दिन गोवर्धन महाराज की पूजा की परंपरा द्वापर काल से चली आ रही है। इस पर्व को देश के अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न तरह से मनाते हैं। गोवर्धन को अन्नकूट पर्व भी कहा जाता है। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाकर अर्पित किए जाते हैं तो वहीं, दक्षिणी भारत के हिस्सों में इस दिन राजा महाबली की पूजा का विधान है।

सालभर के लिए हो जाते हैं सुखी
हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाए जाने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि यदि आज के दिन कोई दुखी है तो सालभर वह दुखी रहेगा, इसलिए गोवर्धन यानी अन्नकूट पूजा को पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाना चाहिए। इस दिन जो पवित्र भाव से भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण का ध्यान पूजन करता है वह सालभर के लिए सुखी और समृद्ध बना रहता है।

इसलिए होती है गौमाता की पूजा
दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। कई जगह लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। शास्त्रों के अनुसार गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इसकी वजह है जैसे देवी लक्ष्मी सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी तरह गौमाता भी हमें स्वास्थ्य रूपी धन देती हैं। इस कारण लोग गौमाता के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए गोर्वधन पूजा में प्रतीक स्वरूप गाय की पूजा करते हैं। इस दिन राजा बलि, अन्नकूट, मार्गपाली आदि उत्सव भी मनाएं जाते हैं।

ऐसे होती है गोवर्धन पूजा
दरअसल, अन्नकूट या गोवर्धन पूजा मनाने की प्रथा की शुरुआत भगवान कृष्ण के अवतार के बाद से द्वापर युग से हुई। इस दिन आप गाय, बैल आदि पशुओं का धूप, चंदन और फूल माला आदि से पूजन कर सकते हैं। इस दिन गौमाता की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती की जाती है। इस दिन घर के आंगन में गाय के गोबर से पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। कुछ जगह गोवर्धन नाथ जी की प्रतिमूर्ति बनाकर पूजन करते हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

56 भोग का चढ़ता है चढ़ावा
इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल, दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते हैं और फिर उसकी परिक्रमा लगाते हैं। वहीं इस दिन भगवान गोवर्धन के लिए भोग व नैवेद्य में नित्य के नियमित पद्धार्थ के अलावा यथाशक्ति अन्न से बने कच्चे-पक्के भोग, फल, फूल के साथ छप्पन भोग लगाया जाता है। दरअसल छप्पन भोग  बनाकर भगवान को अर्पण करने का विधान भागवत में बताया गया है। इसके बाद फिर सभी सामग्री को अपने परिवार, मित्रों में प्रसाद स्वरूप बांटकर ग्रहण करते हैं।

ऐसे शुरू हुई गोवर्धन पूजा का परंपरा, गोवर्धन पूजा कथा
शास्त्रों के अनुसार गोवर्धन पूजा की परंपरा द्वापर युग से होती आ रही है। गोवर्धन पूजा से पहले ब्रज में इंद्रदेव की पूजा होती थी, मगर भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों को समझाया कि इंद्र हमें कोई लाभ नहीं प्रदान करते हैं बल्कि वर्षा कराना उनका धर्म है, वह अपना काम कर रहे हैं। इसकी जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करें जो हमारे गौधन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है, जिससे हमारा पर्यावरण भी शुद्ध रहता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण चाहते थे कि ब्रज के लोग गौधन एवं पर्यावरण के महत्व को समझें और उसकी रक्षा करें, हमारे जीवन में गाय माता का विशेष महत्व है। गाय से हमें दूध प्राप्त होता है जो हमारे लिए बहतु ही आवश्यक है।

श्रीकृष्ण के स्वरूप में होती है पूजा
गोवर्धन ब्रज में स्थित एक छोटी पहाड़ी है, लेकिन इसे पर्वतों का राजा अर्थात् गिरिराज के रूप में जाना जाता है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे भगवान श्रीकृष्ण के समय के एक मात्र स्थायी व स्थिर अवशेष का दर्जा प्राप्त है। ऐसा माना जाता है कि उस समय की यमुना नदी भी समय-समय पर अपनी धारा बदलती रही है, लेकिन गोवर्धन पर्वत आज भी अपने मूल स्थान पर ही स्थित है। इस कारण से इन्हें भगवान कृष्ण का स्वरूप भी मानकर आज भी इस दिन पूजा जाता है।


Source:https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/dharam-karam/vrat-tyohar/why-we-do-govardhan-puja-and-how-we-celebrate-this-68427/




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